एकता शायरी हिन्दी में Ekata Shayari Hindi

एकता शायरी हिन्दी में Ekata Shayari Hindi

इस पोस्ट में हम हिन्दी में एकता और भाईचारा टाॅपिक पर चुनिंदा शायरी लेकर आए हैं । Click to Read Shayari on Ekata topic in Hindi

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मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं,
मेरे हल्क़े में आते हैं ‘तुलसी’ भी और ‘जामी’ भी।
-क़ैशर शमीम

सब को उल्फ़त के मरकज़ पे लाऊँगा मैं,
एकता का दिया फिर जलाऊँगा मैं ।
-कँवल डिबाइवी

मेरी दुनिया में न पूरब है, न पच्छिम कोई,
सारे इनसान सिमट आये खुली बाहों में।
-कैफ़ी आज़मी

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।
– अल्लामा इक़बाल

सभी थे एकता के हक़ में लेकिन,
सभी ने अपनी अपनी शर्त रख दी।
-दीपक जैन दीप

हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं,
हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है ।
-कँवल ज़ियाई

एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं,
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने।
-अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

 

निगाहें शायरी

द व्हाइट टाइगर उपन्यास समीक्षा

अटल बिहारी बाजपेयी जी की 25 कविताएँ

 

वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा,
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है।
-बशीर बद्र

‘हफ़ीज़’ अपनी बोली मोहब्बत की बोली,
न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी।
-हनीफ जालंधरी

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है,
जंग क्या मसअलों का हल देगी।
-साहिर लुधियानवी

दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो,
निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो।
-जाफ़र मलीहाबादी

यही है इबादत यही दीन ओ ईमाँ,
कि काम आए दुनिया में इंसाँ के इंसाँ।
-अल्ताफ़ हुसैन हाली

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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं।
-राहत इंदौरी

तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा,
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा।
-साहिर लुधियानवी

मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए,
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ।
-मिर्ज़ा अतहर ज़िया

ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है,
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है।
-चरण सिंह बशर

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें,
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत।
-बशीर बद्र

हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं,
हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है।
-कँवल ज़ियाई

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए।
-गोपालदास नीरज

अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में,

कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे।

-मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

निगाहें शायरी

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अटल बिहारी बाजपेयी जी की 25 कविताएँ

सगी बहनों का जो रिश्ता रिश्ता है उर्दू और हिन्दी में,

कहीं दुनिया की दो ज़िंदा ज़बानों में नहीं मिलता।

-मुनव्वर राना

 

इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए,

जिस का हम-साए के आँगन में भी साया जाए।

-ज़फर ज़ैदी

 

नफ़रत के ख़ज़ाने में तो कुछ भी नहीं बाक़ी,

थोड़ा सा गुज़ारे के लिए प्यार बचाएँ।

-इरफ़ान सिद्दीक़ी

 

सुनो हिन्दू मुसलमानो कि फ़ैज़-ए-इश्क़ से ‘हातिम’,

हुआ आज़ाद क़ैद-ए-मज़हब-ओ-मशरब से अब फ़ारिग़।

-शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

 

किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है,

ग़रज़ बारह महीने तीस दिन हम को मोहर्रम है।

-रिन्द लखनवी

 

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ,
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ।
-बहादुर शाह जफ़र

 

हम अहल-ए-दिल ने मेयार-ए-मोहब्बत भी बदल डाले,

जो ग़म हर फ़र्द का ग़म है उसी को ग़म समझते हैं।

-अली जव्वाद ज़ैदी

 

अहल-ए-हुनर के दिल में धड़कते हैं सब के दिल,

सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।

-फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

निगाहें शायरी

द व्हाइट टाइगर उपन्यास समीक्षा

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एकता पर कुछ अन्य शायरियाँ

ताकत बढ़ती है जहाँ होती है एकता,
इसी से मिलती है दुनिया में सफलता।

सारी उँगलियाँ समेटों तो मुट्ठी बन जाती हैं,
यहीं ताकत की निशानी कहलाती हैं।

अकेले में अक्सर हम अपनी परछाइयों से डर जाते हैं,
साथ मिले गर किसी का तो हम दुनिया जीत जाते हैं।

पहले जमीं बँटी फिर घर भी बँट गया,
इंसान अपने आप में कितना सिमट गया।

जमीनें बाँटते फिरते हो, आसमान बाटों तो माने,
अलग किये इंसान बड़े, परिंदे छाटों तो माने,
जब पैदा हुआ था आदम तो क्या था,
हिन्दू या मुसलमान, मजहब बताओ तो माने।

ईमानदारी, खुद्दारी, स्वाभिमान, परिश्रम
खुद में इन्हें मिला लो ताकत बन जाएँ।

मुश्किलों में अक्सर अपने ही अपनो के लिए तकलीफ सहते है,
इसलिए इस को हम एकता की मिसाल कहते हैं।

प्रेम जोड़ती है इसलिए प्रेम से ताकत बढ़ती हैं,
नफ़रत तोड़ती है इसलिए नफ़रत से ताकत घटती है।

कोई पूजे पत्थर को, कोई सजदे में अपना सर झुकाते है,
ये एक ही है बस कुछ इसे पूजा, तो कुछ इसे अपना ईमान कहते है,
एक ही रिवाज़, एक ही रसम, बस कुछ अंदाज़ बदल जाते है,
वरना एक ही है जिसे कुछ उपवास, तो कुछ रमज़ान कहते है।

तुम राम कहो, वो रहीम कहें,
दोनों की ग़रज़ अल्लाह से है।
तुम दीन कहो, वो धर्म कहें,
मंशा तो उसी की राह से है।
तुम इश्क कहो, वो प्रेम कहें,
मतलब तो उसकी चाह से है।
वह जोगी हो, तुम सालिक हो,
मक़सूद दिले आगाह से है।

जाती पाती के नाम पर इंसान ने बेच दिया इस जहान को,
कुछ इसे कृपा कहते है, कुछ इसे खुदा का फरमान कहते है।
हम तो सोच समझकर भी कुछ समझ नहीं पाते यारो,
कुछ ऐसी बाते ये नादान परिंदे, बेजुबान कहते है।

अजीब मखलूक है यारो जिसे लोग इंसान कहते है,
आज फिर हम अपने दिल का एक सच बयान कहते है।
न ही फर्क एक तिनके का भी न ही खून का रंग कुछ और है,
बस फर्क ये की किसी को लोग हिन्दू, तो किसी को मुसलमान कहते है।

‘मालिक मेरे नमाज की चादर सँवार दो,
दीने अपने बुला लो हमें गरीब नवाज,
बहुत उठाए अलम, रंजो सहे, गम भी सहे,
अपनी कमाली में छुपा लो हमें गरीब नवाज।

बड़े अनमोल हे ये खून के रिश्ते,
इनको तू बेकार न कर,
मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई,
घर के आँगन में दीवार ना कर।
याद तेरी द‍ीदार बरस में पाऊँ।
छूटे नहीं लागी तेरी, प्रीतिमा को पाऊँ।
रोजा सजाऊँ, पाऊँ रमजान महीना।’

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,
मस्जिद में भजन मंदिरों में अज़ान हो,
खून का रंग फिर एक जैसा हो,
तुम मनाओ दिवाली मेरे घर रमजान हो।
दोस्ताना इतना बरकरार रखो कि,
मजहब बीच में न आये कभी,
तुम उसे मंदिर तक छोड़ दो ,
वो तुम्हें मस्जिद छोड़ आये कभी।

मैं मुस्लिम हूँ, तू हिन्दू है, हैं दोनों इंसान,
ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू पढ ले कुरान,
अपने तो दिल में है दोस्त, बस एक ही अरमान,
एक थाली में खाना खाये सारा हिन्दुस्तान।
संस्कार और संस्कृति की शान मिले ऐसे,
हिन्दू मुस्लिम और हिंदुस्तान मिले ऐसे
हम मिलजुल के रहे ऐसे कि
मंदिर में अल्लाह और मस्जिद में राम बसे जैसे।

क्या क़त्ल व ग़ारत ख़ूंरेज़ी,
तारीफ़ यही ईमान की है।
क्या आपस में लड़कर मरना,
तालीम यही कुरआन की है!
इंसाफ़ करो, तफ़सीर यही
क्या वेदों के फ़रमन की है।
क्या सचमुच यह ख़ूंख़ारी है,
आला ख़सलत इंसान की है?

निगाहें शायरी

द व्हाइट टाइगर उपन्यास समीक्षा

अटल बिहारी बाजपेयी जी की 25 कविताएँ

तकबीर का जो कुछ मतलब है,
नाकस की भी मंशा है वही।
तुम जिनको नमाजे़ कहते हो,
हिंदू के लिए पूजा है वही।
फिर लड़ने से क्या हासिल है?
ज़ईफ़ हम, हो तुम नादान नहीं।
भाई पर दौड़े गुर्रा कर,
वो हो सकते इंसान नहीं।

एक ही है सबकी मंजिल बस लफ़्ज़ों के तराने बदल जाते है दोस्तों,
वो एक ही मुकाम है, जिसे कुछ स्वर्ग तो कुछ जन्नत का दरबार कहते है।
कुछ जाते है मंदिरो में, कुछ मस्जिदों की राह अपनाते है,
पर मक़सद तो सबका एक ही, जिसे लोग ख़ुशी की फ़रियाद कहते है।

कुछ जाते है मंदिरो में, कुछ मस्जिदों की राह अपनाते है,
पर मक़सद तो सबका एक ही, जिसे लोग ख़ुशी की फ़रियाद कहते है।
वो एक ही हस्ती, एक ही वजूद है. जिसने ये सारा जहान बनाया है,
फर्क इतना की कुछ उसे “खुदा” तो कुछ उसे “भगवान्” कहते है।

तुम ऐसे बुरे आमाल पर,
कुछ भी तो ख़ुदा से शर्म करो।
पत्थर जो बना रक्खा है ‘शहीद’,
इस दिल को ज़रा तो नर्म करो।

क्यों लड़ता है, मूरख बंदे,
यह तेरी ख़ामख़याली है।
है पेड़ की जड़ तो एक वही,
हर मज़हब एक-एक डाली है।
बनवाओ शिवाला, या मस्जिद,
है ईंट वही, चूना है वही।
मेमार वही, मज़दूर वही,
मिट्टी है वही, चूना है वही।

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